क्या प्रेम-विवाह करना गुनाह है ?

क्या प्रेम-विवाह करने वाले घुट-घुट कर जीने तथा समाज से तिरस्कार मिलने के लिए अभिशप्त हैं ?

वही माता पिता जो अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने के लिए तत्पर रहते हैं , वो आखिर क्यूँ अपनी संतान के खिलाफ हो जाते हैं जब वो अपनी पसंद की लड़की अथवा लड़के से शादी करना चाहते हैं।

जब बच्चे वयस्क हो जाते हैं , तो वो अपना अच्छा बुरा समझने के लायक हो जाते हैं। इसलिए विवाह जैसा अहम् फैसला संतान की मर्जी से ही होना चाहिए। और माता-पिता को अपने बच्चे की ख़ुशी में शामिल होकर अपने आशीर्वाद के साथ , उनके चयन को सम्मान देकर उनका मनोबल बढ़ाना चाहिए।

जीवन में चाहे आपदाएं आयें, चाहे समस्याएं , चाहे तिरस्कार , प्रत्येक स्थिति में यदि कोई साथ देता है तो वो हैं माता पिता और परिवार वाले। फिर प्रेम विवाह जैसी परिस्थिति में माँ बाप साथ क्यूँ नहीं देते जबकि उस समय उन मासूम बच्चों को समाज के प्रतिकार से बचने के लिए अपनों की सबसे ज्यादा ज़रुरत होती है ।

प्रेम तो एक सदगुण है फिर प्रेम विवाह समाज में इतना उपेक्षित क्यूँ है ? क्या मनचाहा जीवन-साथी पाने के लिए अपनों से जुदा होना ही नियति है मासूमों की ? या फिर क्रूर परिवार वाले अपने झूठे दंभ को पोषित करने के लिए इसी तरह प्रेम करने वालों की जान के प्यासे बने रहेंगे सदा ?

प्रेम विवाह भी उतना ही नैतिक है जितना कि माता पिता के द्वारा किया जाने वाला रश्मी विवाह, लेकिन इसके आड़े आती हैं -जातिवाद, आर्थिक अवस्था, और सबसे ज्यादा “माता पिता का सामाजिक सम्मान”.

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